नीलकंठ महादेव स्तुति
दिनांक: 22 जून 2025
पुष्प से गिरे-गिरे हैं, श्वेत हिम बिखर-बिखर,
ढक गया है पर्वत, मैं देखता जिधर-जिधर।
अप्सरा व देवगण, करें यहाँ भ्रमण-भ्रमण,
नृत्य कर रहे हैं नीलकंठ, हर शिखर-शिखर।
ढोल बज रहा कैलाश, जोरदार ढमक-ढमक,
छटक-झटक पैर बज रहे, नूपुर खनक-खनक।
कर रहा डुडुक-डुडुक, है नीलकंठ का डमर,
सिंधु गामिनी कि कर रही, निनाद छलक-छलक।
यह पवित्र जाह्नवी, जटाओं से चपल-चपल,
डगर खिला-खिला रही है, कोमल कमल-कमल।
चांदनी की कांति देख, आँख खोलते कुमुद,
शशांक शीर्ष शीतल, सुशोभित धवल-धवल।
देवता के देव शिव, सहज-सहज, सरल-सरल,
प्रचंड देवता निवास, चक्षु में अनल-अनल।
खिला रहे हैं धर्मराज को, त्रियंबक प्रभु,
कंठ कालकूट, वासुकी के मुँख गरल-गरल।
✍️ : गुमनाम कवि
भावार्थ :
यह स्तुति हिमालय में स्थित नीलकंठ महादेव को समर्पित है, जहाँ देवता, अप्सराएं और प्रकृति स्वयं शिव के चरणों में नृत्य करती हैं। शिव की महिमा, उनके सौंदर्य और प्रचंडता का अद्भुत चित्रण किया गया है।
निष्कर्ष :
शिव केवल एक देव नहीं, वे सृष्टि के मूल हैं। इस कविता में प्राकृतिक सौंदर्य, भक्ति और वैदिक भावनाओं का सम्मिलन है, जो पाठक को एक आध्यात्मिक अनुभूति देता है।

Leave a Reply