घड़ी | एक संवेदनशील कविता – शायर एरिका

घड़ी

26 जुलाई 2025 | शायर एरिका

शायर एरिका की कविता “घड़ी” आधुनिक मानव जीवन की विडंबनाओं, आध्यात्मिक खोज और समय के साथ हमारे संबंधों पर एक गहन चिंतन प्रस्तुत करती है। यह कविता मात्र शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक दर्शन है जो पाठक को जीवन के मूलभूत प्रश्नों से रूबरू कराती है।

दिन, वो मुलाक़ात अब तो ख्वाब बन गई,  
तेरी हँसी भी अब मेरी तन्हा किताब बन गई।  
हर बात में ढूँढा तुझे मेरी तन्हाई ने,  
ज़िंदगी की वो चहल-पहल अब खाक बन गई।  

वो चेहरा, वो आवाज़, सब साथ रह गई,  
तेरे जाने के बाद भी तू मेरे पास रह गई।  
तेरे बिना हर बात अधूरी सी लगी,  
तेरे बिना ये साँस भी उदास रह गई।  

वो आख़िरी घड़ी थी, जब तू सामने था,  
लब खामोश थे, दिल बहुत बेबस था।  
तेरी आँखों में कुछ टूटा-सा झलकता था,  
हर लफ्ज़ से पहले कोई आह बरबस था।

📖 भावार्थ:
यह कविता उस अनमोल मुलाक़ात की यादों को समर्पित है, जो अब सिर्फ़ एक सपना (ख्वाब) बनकर रह गई है।
कवि कहता है कि —
तुम्हारी हँसी, तुम्हारा साथ, सब कुछ अब मेरी तन्हाई में बंद एक किताब की तरह बन गया है।
मैंने हर लम्हे में तुम्हें ढूँढा — लेकिन अब वो ज़िंदगी, जिसमें चहल-पहल थी,
तुम्हारे बिना सूनी और बेजान (खाक) हो गई।

तुम्हारा चेहरा, आवाज़ — सब अब भी मेरे साथ हैं,
तुम चले गए लेकिन तुम्हारी यादें मेरी साँसों में रची-बसी रह गईं।
तेरे बिना हर बात अधूरी लगती है,
जैसे साँसें चल रही हैं पर उनमें ख़ुशी नहीं।

सबसे गहरा क्षण वह था जब तुम आख़िरी बार मेरे सामने थे —
हम दोनों चुप थे, पर दिल में एक बेबस तूफान था।
तेरी आँखों में टूटी हुई उम्मीदें और दर्द झलक रहा था,
हर बात कहने से पहले एक अहसास-भरी आह उठती थी।

🌹 सारांश रूप में:
यह कविता एक प्रेमी की उन यादों को बयाँ करती है जो बिछड़ने के बाद भी मन से जुदा नहीं होतीं।
कहने को सब बीत गया, लेकिन यादें, दर्द और प्रेम की छाया अब भी उसके जीवन में बनी हुई है।

✍️ लेखक टिप्पणी:
यह कविता “घड़ी” समय की महत्ता, परिवर्तनशीलता और जीवन पर उसके प्रभाव को अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती है।
घड़ी यहाँ केवल समय बताने का यंत्र नहीं बल्कि जीवन का प्रतीक बन जाती है — जो लगातार आगे बढ़ती रहती है, कभी किसी के लिए रुकती नहीं।

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