Almari – Shabd Sahity Kavita Pratiyogita 2025

 

 

अलमारी

6 जुलाई 2025 | गुमनाम कवि

सुकून की ज़िंदगी छोड़ , भाग रहे दोपहर में पहाड़ी लोग ,
अब दुआ-सलाम भी कम करते हैं, सफर में पहाड़ी लोग ।
उठाया हुआ है किराए पर , एक अठारह गज का कमरा ,
खरीद रहे हैं रेडिमेड अलमारी सभी, शहर में पहाड़ी लोग।।

🌿

अलमारी

6 जुलाई 2025 | सलोनी खन्ना

वो बचपन का दिन सुहाना लगता,
दिल की धड़कनों में अब भी वो एहसास बसा है।
ईंटों और पत्थरों से बना वो मकान,
जिसमें मेरी रूह अब भी धीरे-धीरे साँस लेती है।।

कोने में खड़ी अलमारी —
माँ की तरह चुपचाप सब कुछ समेटे हुए,
हर बार खोलने पर यादों की बूँदें गिरा देती है,
और मेरी आँखें खुद ही भीग जाती हैं।।

उनकी पुरानी साड़ी जब ओढ़ती हूँ,
वो खुशबू, वो स्पर्श… जैसे माँ लौट आई हो।
गली के उस नुक्कड़ से गुज़रती हूँ,
तो माँ की हँसी की टूटी छवि कहीं कोने में चमक जाती है।।

वो टिक-टिक करती घड़ी — अब बंद पड़ी है,
पर उसके भीतर माँ की आवाज़ अभी भी गूँजती है।
दीवारें जो कभी रंगों से बोलती थी,
अब खामोशी ओढ़े बैठी हैं — फीकी, थकी और उदास

कभी वो अलमारी मेरा खज़ाना थी,
अब माँ की यादों की समाधि बन गई है।
एक ज़माना था जब उनके होने से हर दिन गुलजार लगता था,
आज उन्हीं की यादों में एक बेरंग ज़िंदगी गुजरती है।।

अलमारी

6 जुलाई 2025 | अनिरुद्ध बोडाडे

एक कोना घर का सजी-संवरी,
चुपचाप खड़ी है एक अलमारी।

उसमें छुपे हैं कितने किस्से,
बचपन के ख्वाब, अधूरे हिस्से।

पुरानी साड़ियाँ, माँ की चुनरी,
बाबूजी की घड़ी, यादें सुनहरी।

कुछ किताबें धूल भरी,
जिनमें अब भी खुशबू बसती कभी।

छोटे-छोटे डब्बों में बंधी आशाएँ,
अनकही बातें, छुपी इच्छाएँ।

हर खोलने पर बिखर जाती,
बीते पलों की कोई कहानी।

न सामान भर की बस एक जगह,
ये दिल का भी इक हिस्सा है सच।

जो सहेज के रखती है उम्र भर,
जीवन के हर छोटे-बड़े सफ़र।

🕊️

अलमारी

6 जुलाई 2025 | शायर एरिका

तेरे गुलाब तेरे ख़त अलमारी में रखे हैं,
जैसे ख़ामोश जज़्बात दिल की गलियों में रखे हैं।

कोई पूछे क्यों नहीं मुरझाए ये फूल अब तक,
कह दूँ ये इश्क़ है जो साँसों की ताबीर में रखे हैं।

अलमारी – यादों की चुप अलमारी

हर घर में एक कोना ऐसा जरूर होता है जहाँ वक्त टिक कर बैठ जाता है। हमारे घर में वो कोना अलमारी का था।
एक सीधी-सादी सी, पुरानी लकड़ी की बनी अलमारी, जो सालों से उसी जगह पर खड़ी थी — जैसे उसने समय को पकड़ रखा हो।
वो अलमारी केवल कपड़े रखने की चीज़ नहीं थी, उसमें छुपे थे सालों के अनुभव, रिश्तों की परतें, और अनकहे जज़्बात।

अलमारी में माँ की वो साड़ियाँ थीं जो उन्होंने त्योहारों में पहनी थीं। हर साड़ी एक कहानी कहती थी — कहीं हल्दी का निशान था,
कहीं आँसूओं से भीगी हुई किनारी। एक डिब्बा था जिसमें माँ की चूड़ियाँ थीं, जिन्हें पहनकर वो आँगन में लोरी गुनगुनाती थीं।
बाबूजी की वो घड़ी भी वहीं थी, जो अब चलती नहीं थी लेकिन उसमें उनका समय बंद था — वो वक्त जब वो हमें कहानियाँ सुनाते थे,
जब उनका स्पर्श सिर पर छांव जैसा लगता था।

अलमारी के पीछे की दीवार पर पेंसिल से हम भाई-बहनों की ऊँचाई के निशान बने थे। हर साल माँ कहती, “आ जा बेटा, देखूं तू कितना बड़ा हुआ।”
और हम उछलकर उस निशान से ऊपर जाने की कोशिश करते थे। अब वो निशान फीके पड़ गए हैं, जैसे बचपन की शरारतें भी धीरे-धीरे धुंधली हो गई हों।
लेकिन अलमारी अब भी वैसे ही खड़ी है, जैसे कोई बूढ़ा दरख़्त जो देख रहा हो — कैसे पत्ते झड़ते हैं, कैसे मौसम बदलते हैं।

जब हम पहाड़ से शहर आए, एक रेडीमेड अलमारी खरीदी गई — बड़ी, चमचमाती, सुंदर सी। उसमें आधुनिकता थी लेकिन आत्मा नहीं।
माँ की उस पुरानी अलमारी में जो अपनापन था, वो यहाँ नहीं था। नई अलमारी में कपड़े तो बहुत थे, पर कोई कहानी नहीं,
कोई टूटा बटन नहीं, कोई बचपन की रुमाल नहीं। माँ की अलमारी अब गाँव में है — दीमकों की दस्तकें सुन रही है,
लेकिन अभी भी कुछ चीजें वैसे की वैसे रखी हैं, जैसे माँ छोड़ गई थीं।

एक बार जब गांव लौटा, तो उस अलमारी को खोला। उसमें एक पुराना खत रखा था — पीला पड़ चुका कागज़, लेकिन लिखा शब्द अब भी ताज़ा लगा।
माँ ने लिखा था — “बेटा, जब तू यह पढ़ रहा होगा, शायद मैं न रहूँ। लेकिन मेरी चीज़ें तुझे वो सब बताएँगी जो मैं जीते जी न कह पाई।”
वो खत मैंने अपने दिल में रख लिया।
अलमारी अब मेरे लिए सिर्फ लकड़ी की नहीं रही — वो मेरी माँ बन गई थी, मेरी यादों की संधि बन गई थी।

जब भी कविता लिखता हूँ, अलमारी ज़रूर आ जाती है किसी न किसी रूप में। कभी माँ के आंचल के रूप में, कभी चूड़ियों की खनक के रूप में,
कभी पुराने रुमाल की तरह जिस पर माँ ने नाम काढ़ा था। अब जबकि डिजिटल दौर में सब कुछ ऑनलाइन हो गया है,
अलमारी जैसी चीज़ें “अनलॉग्ड मेमोरी” बन कर रह गई हैं। कोई उनका महत्व नहीं समझता, लेकिन उनके बिना कोई कहानी पूरी नहीं होती।

कई बार सोचता हूँ — अगर अलमारी न होती, तो क्या मैं कवि बन पाता? क्या मैं माँ को उतना महसूस कर पाता जितना अब करता हूँ?
अलमारी न होती, तो शायद मेरी कविता में वो संवेदना ही न होती जो लोगों को जोड़ती है।
क्योंकि जब तक चीज़ें हमारे पास होती हैं, हम उन्हें सामान समझते हैं। जब वे छूट जाती हैं,
तब समझ में आता है कि वह वस्तु नहीं, अनुभव थी; लकड़ी नहीं, भावना थी; अलमारी नहीं, माँ थी।

अब जब कोई मुझसे पूछता है — “आपकी सबसे कीमती चीज़ क्या है?”
तो मैं मुस्कुराकर कहता हूँ — “मेरे गाँव में माँ की वो पुरानी अलमारी।”
वो अलमारी जिसने मुझे जीना सिखाया, यादें सँभालना सिखाया, और सबसे बड़ी बात — **”खाली होने पर भी भरा रहना सिखाया।”**

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *